ज़िंदगी में दुख भरा ये मोड़ कैसा आ गया, नाव मझधार में थी, तूफ़ान कैसा आ गया। तूफ़ान तो तूफ़ान था, घनघोर बादल छा गया, देखते ही देखते बिजली की गड़गड़ाहट कानों तक आने लगी। हवाओं का तेज़ झोंका आंधी बनकर चलने लगा, आसमान से पानी की बूंदें लहराकर गिरने लगीं। अब मुझे ऐसा लगे, बचना यहां मुमकिन नहीं, देखकर ये दुख का मौसम, अब मुझमें इतनी हिम्मत भी नहीं कि और आगे बढ़ सकूं कहीं। पतवार भी अब हाथों से छूट जाना चाहती है, कुछ समझ में नहीं आता क्या करूं, क्या न करूं। मैं तो खुद कुछ नहीं, मासूम ज़िंदगियां मेरे साथ हैं, अब मेरी ज़िंदगी की हर डोर बस भगवान के हाथ है। ये मोड़ कैसा आ गया - Hindi Kavita ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे मुश्किल मोड़ आ जाते हैं, जहां इंसान को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई नहीं देता। चारों तरफ परेशानियां, दुख और संघर्ष दिखाई देने लगते हैं। ऐसी ही परिस्थितियों को ये मोड़ कैसा आ गया इस हिंदी कविता में नाव, मझधार और तूफ़ान के माध्यम से व्यक्त किया गया है। मझधार में फंसी नाव उस इंसान का प्रतीक है जो जीवन की...